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Tuesday, December 28, 2010


घुली है नरम नरम सी ठंडक ,       
फिर सर्द हवा ने घेरा है !
छितराया है कोहरा,अपना हाथ पसारे ; 
जैसे कह रहा हो;ये सारा जहाँ मेरा है !!

आसमान में छाया रहता,
छुटपुट  बादलों का रेला !
जब भी सर उठाके देखूं;
पता ना चले सांझ या सवेरा है !!

सूरज जी आँख मिचोली करते;
आते जाते , जाते आते !
थोड़ी तपिश दिखा दो हमको,
अजी डाला कहाँ पे डेरा है ?

जिधर घूमते सूरज भैया,
अपना आसन भी हिल जाता !
गर्मी में पूछा ना किसी ने ;
ये वक़्त का कैसा फेरा है !

सर्दी आती , याद दिलाती ;
गरम जलेबी, गजक पापड़ी !
अंगीठी, चूल्हे में सिकती रोटी ;
किन यादों ने मुझको घेरा है !

जाने दो बचपन में मुझको ;
मुंह से भाप निकाल कर !
कांच पे डाला करते थे,
लिखते थे अपना नाम, और कहते
ये मेरा है , ये मेरा है !

हर मौसम के अपने मिजाज;
कुछ खट्टे ! कुछ अच्छे !
हर मौसम से जुड़ी कई बातें ;
कहीं कोने में उनका बसेरा है !

.................. नवनीत गोस्वामी

3 comments:

  1. नवनीते तू पहली गोस्वामी है जिसमें दिमाग है...तुझे हमको जात बाहर करना पड़ेगा...पैली बेर तो हम छोड़ देते हैं इब दूसरी बेर अगर तमने ऐसी गज़ब की कबिता लिखी तो फिर देख लेना...तुझे बेरा पड़ जाएगा.
    कबिता पढ़ के ठण्ड पड़ गयी.

    नीरज

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  2. Thank U Chacha ! Mei aapko batana bhool gayi ki "kavita padhne se pahle anurodh hai ki ise razai mei baith kar padhe" . . !

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  3. आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा. हिंदी लेखन को बढ़ावा देने के लिए आपका आभार. आपका ब्लॉग दिनोदिन उन्नति की ओर अग्रसर हो, आपकी लेखन विधा प्रशंसनीय है. आप हमारे ब्लॉग पर भी अवश्य पधारें, यदि हमारा प्रयास आपको पसंद आये तो "अनुसरण कर्ता" बनकर हमारा उत्साहवर्धन अवश्य करें. साथ ही अपने अमूल्य सुझावों से हमें अवगत भी कराएँ, ताकि इस मंच को हम नयी दिशा दे सकें. धन्यवाद . आपकी प्रतीक्षा में ....
    भारतीय ब्लॉग लेखक मंच
    डंके की चोट पर

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