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Friday, August 06, 2010

Ek Gilahari !

कभी कभी बीते पलों को याद करतें हैं तो उस पल से जुडी सब कड़ियाँ मन के परदे पर विचरण करती दिखाई देने लगती हैं. मेरे ऑफिस जाने के रास्ते में २ - ३ कॉलेज है,जब भी वहाँ से गुजरती हू मेरे मन में मेरे कॉलेज और हॉस्टल  की तस्वीर जरूर प्रकट हो जाती है. कॉलेज और हॉस्टल एक ही premises  में थे. सबसे ज्यादा याद आता है - मेरा कमरा. जहाँ सबसे ज्यादा वक़्त बीतता था, लेकिन परीक्षा के दिनों में सबसे कम वक़्त के लिए मैं वहां दिखाई देती थी. क्योंकि मुझे एकांत में बैठ कर पढने की आदत थी, और वो थी- कॉलेज कैम्पस में दूर बड़े से मैदान में लगे पेड़ों के नीचे, ठंडी छाँव में. और दूसरी जगह थी मेरा क्लासरूम, क्लासेस ख़तम होने के बाद मैं फिर से अपनी क्लास में जाती थी, और प्रोफेसर की तरह लेक्चर देती थी. पर क्लास रूम के बाहर पेड़ के नीचे अलग मज़ा था. वहाँ मेरी किसी से पहचान भी हुई, उसी के बारे में बताना चाहती हूँ :-


जब भी याद करूँ, परीक्षा
एक गिलहरी आ जाती याद !
फुदक फुदक कर लाती कही से
एक मूंगफली अपने साथ !!

हाय परीक्षा आती जब सर पे
दूर कोई ठोर हम ढूँढा करते !
हर कोई दिखता पढता,
हॉस्टल कैम्पस के पेड़ों के तले !!

वहीँ दिखती थी एक गिलहरी
बड़ी शाख से उतरती हुई !
पहले दिन तो डरी डरी सी
समझे मुझको कोई प्रहरी !!

कुछ दिन मुझ पर नज़र रखी,
हर हरकत लेती पहचान !
लेकिन कुछ ही दिन में देखो,
नहीं रही मुझसे अनजान !!

तुरत फुरत, पर संभल संभल के,
रोज़ निकलती कोटर से !
मुझको देखे टुकर टुकर वो,
अपने दो नन्हे नैनो से !!

इधर उधर, आस पास ही,
लगी खोजने अपना भोजन !
नन्हे नन्हे पैरों से अपने,
चलती होगी बस "इक योजन" !!

एक मूंगफली मिली कही से,
रंग लायी उसकी मेहनत !
सूंघे उसको अलट पलट कर,
मिटाने को अपना हर शक  !!

लेकर अपने दो पंजो में,
बैठ गयी वो पूंछ पसार !
नन्हे जीव कि समझ तो देखो,
कैसे ग्रहण किया आहार !!

सबसे पहले कुतर कुतर कर,
उसने दिया छिलके को उतार !
उस में से निकले दाने दो (२),
लेकिन देखो संतोष अपार !!

ये नन्ही सी जान को देखो,
समझदार भी, नटखट भी !
याद आये मुझको वो तब तब
हो परीक्षा  के दिन या
दिखे मूंगफली मुझे कभी !!

. . . . . . .नवनीत गोस्वामी

2 comments:

  1. अति उत्तम कविता ...गिलहरी और परीक्षा के दिन फिर से याद आ गए...वाह...
    नीरज

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  2. अच्छी लगी!
    --
    www.myexperimentswithloveandlife.blogspot.com

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